xmlns:og='http://ogp.me/ns#' भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों का नाम कैसे पड़ा - जाने संक्षिप्त विवरण Hindi में (Part-5)

भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों का नाम कैसे पड़ा - जाने संक्षिप्त विवरण Hindi में (Part-5)

११. श्रीरामेश्वर 

भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों का नाम कैसे पड़ा - जाने संक्षिप्त विवरण  Hindi में (Part-5)
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भगवान शिव का ग्यारहवां ज्योतिर्लिंग सेतुबंध रामेश्वर है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के कर कमलों से इसकी स्थापना हुई थी। लंका पर चढ़ाई करने के लिए जाते हुए जब भगवान श्रीराम यहां पहुंचे तो उन्होंने समुद्र तटपर बालूका से एक शिवलिंग का निर्माण कर उसका पूजन किया। यह भी कहा जाता है कि समुद्र तटपर भगवान श्रीराम जल पी रही रहे थे कि एकाएक अकाशवाणी हुई --- 'मेरी पूजा किए बिना ही जल पीते हो ?' इस वाणी को सुनकर भगवान ने वहां स

मुद्र तटपर बालूका की लिंग मूर्ति बनाकर शिवजी की पूजा की और रावण पर विजय प्राप्त करने का आशीर्वाद मांगा, जो भगवान शंकर ने उन्हें सहर्ष से प्रदान किया। उन्होंने लोकोपकारार्थ  ज्योतिर्लिंग रूप से सदा के लिए वहां वास करने की प्रार्थना भी स्वीकार कर ली। 

एक दूसरा इतिहास इस लिंग-स्थापना के संबंध में है कि जब रावण का वध करके भगवान श्री राम श्री सीता जी को लेकर दलबल सहित वापस आने लगे, तब समुद्र के इस पार गंधमादन पर्वत पर पहला पड़ाव डाल दिया। उनका आगमन जानकर मुनी-समाज भी वहां आया। यथोचित सत्कार के उपरांत श्री राम ने उनसे पुलसत्य-कुल का विनाश करने के कारण ब्रह्माहत्या के पातक से मुक्त होने का उपाय पूछा। ऋषियों ने कहा, ---- 'प्रभु !  शिवलिंग की स्थापना से सारे पाप तत्क्षण कट जाते हैं।' 

तत्पश्चात भगवान श्री राम ने हनुमान जी को कैलाश से शिवलिंग लाने का आदेश दिया। वे क्षणमात्र में कैलाश जा पहुंचे, पर वहां शिवजी के दर्शन नहीं हुए। अतएव वे वहां शिवजी के दर्शनार्थ तप करने लगे और उनके दर्शन प्राप्त करके उन्होंने शिवलिंग लेकर गंधमादन पर्वत की ओर प्रस्थान किया। इधर जब तक वह आए तब तक जेष्ठ शुक्ल दशमी पर बुधवार को अत्यंत शुभ महत्वपूर्ण में शिव-स्थापना भी हो चुकी थी। उन्होंने हनुमान जी के आने में विलंब समझकर मुहूर्त निकलता देख श्री राम जी द्वारा निर्मित बालुका लिंग की स्थापना कर दी। इस पर पवन पुत्र अत्यंत दुखी हुए। कृपानिधान भगवान राम ने भक्त की व्यथा समझ कर उनके द्वारा लाए शिवलिंग को वही 'हनुमदीश्वर' नाम से स्थापित कर दिया। श्री रामेश्वर एवं हनुमदीश्वरका दिव्य माहात्म्य बड़े विस्तार के साथ सकंदपुराण, शिव पुराण आदि में आया है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने 'रामेश्वर' महादेव के दर्शन के विषय में कहा है।-----

जे रामेस्वर दरसनु करिहहिं। ते तनु तजि मम लोक सिधरिहहिं।।


श्री रामेश्वर जी का मंदिर अत्यंत भव्य एवं विशाल है। इस मंदिर में शिवजी की प्रधान लिंगमूर्ति के अतिरिक्त और भी अनेक शिव मूर्तियां तथा अन्य मूर्तियां है। नंदी की एक बहुत बड़ी मूर्ति है। मंदिर के अंदर अनेक कुएँ हैं, जो तीर्थ कहलाते हैं। गंगोत्री के गंगाजल को श्री रामेश्वर ज्योतिर्लिंग पर चढ़ाने का बड़ा महत्व है। श्री रामेश्वर से लगभग १० मील की दूरी पर धनुष्कोटी नामक तीर्थ है जो श्रद्धादि के लिए प्रशस्त तीर्थ है। श्री रामेश्वर तीर्थ के आसपास और भी अनेकों तीर्थ है।

१२. श्रीघुमेश्वर 

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धूमेश्वर, घुसृणेश्वर या घृष्णेश्वर नामक ज्योतिर्लिंग मध्य रेलवे की मनमाड-पूर्णा लाइन पर मनमाड से लगभग १००  किलोमीटर दूर दौलताबाद स्टेशन से १० किलोमीटर दूर वेरुल ग्राम के पास स्थित है। शिव पुराण में इस लिंग के प्रादुर्भाव के संबंध में एक रोचक कथा आ यी है, जो संक्षेप में इस प्रकार है। ---

दक्षिण दिशा में एक श्रेष्ठ पर्वत है जिसका नाम देवगिरी है। वह देखने में अद्भुत तथा नित्य परम शोभा से संपन्न है। उसी के निकट भारद्वाज कुल में उत्पन्न सुधर्मा नाम के एक ब्रह्मावेता ब्राह्मण रहते थे। उनकी प्रिय पत्नी का नाम सुदेहा था। दोनों भगवान शंकर के भक्त थे। सुदेहा घर के कार्य में कुशल और पति की सेवा करने वाली थी। सुधर्मा भी वेद वर्णित मार्ग पर चलते थे और नित्य अग्निहोत्र किया करते थे। वे वेद शास्त्र के मर्मज्ञ थे और शिष्यों को पढ़ाया करते थे। धनवान होने के साथ ही बड़े दाता और सौजन्यआदि सद्गुणों के भाजन थे। 

इतना होने पर भी उनके कोई पुत्र नहीं था। ब्राह्मण को तो कोई दुख नहीं था, परंतु उनकी पत्नी इससे बहुत दुखी रहती थी। वह पति से बार-बार पुत्र के लिए प्रार्थना करती थी। पति उसको ज्ञानोपदेश देकर समझाते, परंतु उसका मन नहीं मानता था। अंततोगत्वा ब्राह्मण ने कुछ उपाय भी किया परंतु वे सफल नहीं हुआ तब ब्राह्मणी ने अत्यंत दुखी हो बहुत हठ करके अपने बहन घुश्मा से पति का दूसरा विवाह करा दिया। विवाह से पहले सुधर्मा ने समझाया कि इस समय तो तुम बहन से प्यार कर रही हो, परंतु जब इसके पुत्र हो जाएगा तब इसे स्पर्धा करने लगोगी। उसने वचन दिया कि मैं  कभी डाह नहीं करूंगी। विवाह हो जाने पर घुश्मा दासी की भांति बड़ी बहन की सेवा करने लगी। सुदेहा भी उसे बहुत प्यार करती रही। घुश्मा अपनी शिव भक्ता बहिन की आज्ञा से नित्य १०१  पार्थिव शिवलिंग बनाकर विधि पूर्वक पूजा करने लगी। पूजा कर के निकटवर्ती तालाब में उनका विसर्जन कर देती थी। 

शंकर जी की कृपा से उनके एक सुंदर सौभाग्यवान और सद्गुणसम्पन पुत्र हुआ। घुश्मा का कुछ मान बढ़ा। इसे सुदेहा के मन में डाह पैदा हो गई, पुत्र बढ़ा हुआ। समय पर उसका विवाह हुआ। पुत्रवधू घर में आ गए। अब तो वह और भी जलने लगी। डाह ने उसकी बुद्धि को भ्रष्ट कर दिया और एक दिन उसने रात में सोते हुए पुत्र को मार डाला और उसी तालाब में ले जाकर डाल दिया। जहां घुश्मा प्रतिदिन पार्थिव लिंग विसर्जित करती थी। घर लौट कर सुख पूर्वक सो गई।

सवेरे घुश्मा, उठकर नित्य की भांति, पूजन आदि कर्म करने लगी। ब्राह्मण सुधर्मा भी अपने नित्य कर्म में व्यस्त हो गए। इसी समय उनकी ज्येष्ठ पत्नी सुदेहा भी उठी और बड़े आनंद से घर के कामकाज करने लगी क्योंकि उसके हृदय में पहले जो ईर्ष्या की आग जलती थी। वह अब बुझ गई थी। उधर जब बहू ने उठकर पति की शय्या को देखा तो वह खून से भीगी दिखाई दी और उस पर शरीर के कटे हुए कुछ अंग दिखाई पड़े। वे रोती हुई अपनी सास (घुश्मा) के पास गई और बोली माता आपके पुत्र कहां है ? उनकी शय्या खून से भीगी हुई है और उसपर शरीर के कुछ टुकड़े दिखाई देते हैं। हाय ! मैं मारी गई। किसने यह दुष्कर्म किया है। ऐसा कहती हुई वह भांति-भांति से करुण विलाप करती हुई रोने लगी। 

सुधर्मा की बड़ी पत्नी सुदेहा भी उस समय 'हाय ! मैं मारी गई।' ऐसा कहकर ऊपर से दुखी होने का अभिनय करने लगी। किंतु यह सब सुनकर भी घुश्मा अपने नित्य पार्थीव् पूजन के व्रत से विचलित नहीं हुई। उसका मन बेटे को देखने के लिए तनिक भी उत्सुक नहीं हुआ। उसके पति की भी ऐसी ही व्यवस्था थी। जब तक नित्य नियम पूरा नहीं होता तब तक उन्हें दूसरी किसी बात की चिंता नहीं होती। पूजन समाप्त होने पर घुश्मा ने अपने पुत्र की शय्या पर दृष्टिपात किया तथापि उसने यह सोच कर दु:ख ना माना कि जिन्होंने यह बेटा दिया था, वह इसकी रक्षा करेंगे। एकमात्र वे प्रभु सर्वेश्वर शम्भु ही हमारे रक्षक हैं तो मुझे चिंता करने की क्या आवश्यकता है ? 

यह सोचकर उसने शिव के भरोसे धैर्य धारण किया और उस समय दुख का अनुभव नहीं किया। वह पूर्व पार्थिव शिवलिंग को लेकर स्वस्थ-चित्त से शिव के नामों का उच्चारण करती हुई उस तालाब के किनारे गई। उन पार्थिव लिंगों को तालाब में डालकर जब वह लौटने लगी तो उसे अपना पुत्र उसी तालाब के किनारे खड़ा दिखाई दिया। उस समय अपने पुत्र को सकुशल देखकर घुश्मा को ना हर्ष हुआ ना विषाद। वह पूर्ववत स्वस्थ बनी रही। इसी समय उसपर संतुष्ट हुए ज्योति स्वरूप महेश्वर शिव उसके सामने प्रकट हो गए और बोले ---- 'सुमुखी ! मैं तुम पर प्रसन्न हूं। वर मांगो। तेरी दुष्टा सौत ने इस बच्चे को मार डाला था। अतः मैं उसे त्रिशूल से मारूंगा।' 

तब उसने शिव को प्रणाम किया और यही वर मांगा कि उसकी बड़ी बहन सुदेहा को भगवान क्षमा कर दें। शिव भोले ----- 'उसने तो बड़ा भारी अपकार किया है तुम उसपर उपकार क्यों करती हो ? दुष्कर्म करने वाली सुदेहा  तो दण्ड के योग्य है।'

घुश्मा ने कहा ---- ' देव ! मैंने यह शास्त्र वचन सुन रखा है कि जो अपकार करने वालों पर भी उपकार करता है, उसके दर्शन मात्र से पाप बहुत दूर भाग जाता है। प्रभु ! मैं चाहती हूं कि उसके भी पाप भस्म हो जाए। फिर उससे तो उसने कुकर्म किया है तो करें। मैं ऐसा क्यों करूं। ' 

घुश्मा के ऐसा कहने पर दयासिंधु, भक्तवत्सल महेश्वर और भी प्रसन्न हुए और बोले --- घुश्मे ! तुम कोई और भी वर मांगो। मैं तुम्हारे लिए हितकर वर दूंगा क्योंकि मैं तुम्हारी इस भक्ति से तथा विकारशून्य स्वभाव से बहुत प्रसन्न हूं।' 

भगवान शिव की बात सुनकर घुश्मा बोली ---- 'प्रभु ! यदि आप कर देना चाहते हैं तो लोगों की रक्षा के लिए सदा यहां निवास कीजिए और मेरे नाम से ही आपकी ख्याति हो।' 

तब भगवान शिव बड़ी प्रसन्नता से घुश्मा को अनेक वर देकर वहां ज्योतिर्लिंग रूप में स्थित हो गए और घुश्मा के नाम पर ही घुश्मेश्वर कहलाए और उस समय सरोवर का नाम शिवजी के कथन अनुसार ही शिवालय हो गया। 

उधर सुदेहा भी पुत्र को जीवित देखकर बहुत लज्जित हुई। उसने बहुत पश्चाताप किया और पति तथा बहन के साथ उस शिवलिंग की १०१ दक्षिणावर्त परिक्रमा की। पूजा करके परस्पर मन का मैल दूर हो गया और वे वहां सुख से रहने लगे।

बाकि के ज्योतिर्लिंगो के बारे में जानने के लिए निचे दिए गए पार्ट्स पर क्लिक करें। 

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