xmlns:og='http://ogp.me/ns#' भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों का नाम कैसे पड़ा - जाने संक्षिप्त विवरण Hindi में (Part-3)

भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों का नाम कैसे पड़ा - जाने संक्षिप्त विवरण Hindi में (Part-3)

८.  श्रीत्रियंबकेश्वर 

भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों का नाम कैसे पड़ा - जाने संक्षिप्त विवरण Hindi में (Part-3)
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त्रंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग मुंबई प्रांत के नासिक जिले में स्थित है। समीपवर्ती ब्रम्हगिरी नामक पर्वत से पुतस लीला गोदावरी नदी निकलती है। उत्तर भारत में पाप विमोचीनी गंगा का जो माहात्म्य है वहीं दक्षिण में गोदावरी का है, जैसे गंगावतरण का श्रेय महा तपस्वी भागीरथ जी को है। वैसे ही गोदावरी प्रवाह ऋषि श्रेष्ठ गौतम जी की महान तपस्या का फल है, जो उन्हें भगवान आशुतोष से प्राप्त हुआ था। भगीरथ के महान पर्यटन से भूतल पर अवतरित हुई माता जाह्नवी जैसे भगीरथ कहलाती है, वैसे ही गौतम ऋषि की तपस्या के फलस्वरूप आई हुई गोदावरी का नाम गौतमी गंगा है। बृहस्पति के सिंह राशि में आने पर यहां बड़ा भारी कुंभ मेला लगता है और श्रद्धालुजन गौतमी गंगा में स्नान तथा भगवान त्रंबकेश्वर का दर्शन कर अपने को कृत-कृत्य मानते है। 

शिव पुराण में वर्णन आया है कि गौतम ऋषि तथा गोदावरी और सभी देवताओं की प्रार्थना पर भगवान शिव ने इस स्थापन पर वास करने की कृपा की और त्रियंबकेश्वर नाम से विख्यात हुए। इस ज्योतिर्लिंग आविर्भाव की कथा संपूर्ण पापों का शमन करने वाली है जो संक्षेप में इस प्रकार है।----------- 

प्राचीन काल में गौतम नामक एक परम ऋषि थे और अहल्या उनकी पत्नी थी। दोनों परम धार्मिक तथा सदाचारी थे, तपस्या और लोक उपकार करना ही उनका सर्वस्व था। वह दक्षिण में ब्रह्मागिरी में रहते थे। वहां महा ऋषि गौतम ने दस हज़ार वर्षों तक घोर तपस्या की। एक समय उस क्षेत्र में सौ वर्ष तक बड़ा भयानक अवर्षण हो गया।अन्नादि के अभाव में सर्वत्र अकाल की विभीषिका छा गई। उस समय सभी प्राणी क्षेत्र से अन्यत्र जाकर बसने लगे। परोपकारी गौतम ऋषि ने वरूण देव को प्रसन्न कर एक गर्त को दिव्य जल से परिपूर्ण करा लिया और उन्होंने अखंड दिव्य जल के प्रभाव से भूमि में अन्न भी उपजा लिया। यह समाचार जानकर ऋषि महर्षि तथा सभी प्राणी पुन: उस स्थान में जाकर आनंद से रहने लगे।

संयोग से एक बार ब्राह्मणों की स्त्रियों ने जल लेने के प्रसंग में ऋषि पत्नी अहिल्या से द्वेष कर लिया और उन्होंने अपने प्रति जनों को इस बात के लिए तैयार भी करा लिया कि जिस किसी उपाय से भी इन गौतम ऋषि तथा अहल्या को इस क्षेत्र से बाहर कर दिया जाए, उनके पतियों ने गणेश की आराधना की। भक्तों पर आधीन गणेश जी प्रकट हुए और उनके दुर्भाव को समझते हुए उन्हें इस दुष्कार्य के लिए रोका भी, किंतु अंत में वे 'तथास्तु' कहकर अंतर्ध्यान हो गए। 

इस कार्य की पूर्ति के निर्मित गणेश जी एक दुर्बल गौ का रूप धारण कर गौतम ऋषि के उस क्षेत्र में पहुंच गए जहां जौ और धान उगे थे। वहां गौ कांप रही थी। वह जौ और धान खाने लगी। दैववश गौतम वहां पहुंचे और तिनकों की मुट्ठी से उसे हटाने लगे। तृणों के स्पर्श से गौ पृथ्वी पर गिर पड़ी और ऋषि के सामने ही मर गई। उस समय छिपे हुए गौतम के विरोधी अन्य ऋषियों ने एवं उनकी पत्नियों ने कहा कि गौतम ने अशुभ कर्म कर दिया है। इसके द्वारा गौ की हत्या हो गई है। इसका मुंह देखना पाप है। 

अतः इसे इस स्थान से बहिष्कृत कर दिया जाए। यह कहकर उन्होंने उन्हें वहां से बहिष्कृत कर दिया। गौतम को अत्यंत अपमानित होना पड़ा। गौतम ऋषि ने उन्हीं लोगों से इसका प्रायश्चित पूछा। 'आप लोगों को मुझपर कृपा कृपा चाहिए। आप इस बात को दूर करने का उपाय बताएं। मैं उसे करूंगा।' उन्होंने बताया कि आप पूरी पृथ्वी की तीन बार परिक्रमा करें, मास व्रत करें, इस ब्रह्मागिरी पर सौ बार घूमे, तब जाकर आप की शुद्धि होगी अथवा आप गंगाजल लाकर स्नान करें, एक करोड़ पार्थिव शिवलिंग बनाकर शंकर की पूजा करें, पुनः गंगा स्नान करें और सौ घरों से पार्थिव शिवलिंग को स्नान कराएं तो उद्धार होगा।

गौतम ऋषि ने इस प्रकार कठोर प्रायश्चित किया। भगवान शिव प्रकट हो गये। उन्होंने गौतम से कहा 'महामुनि' मैं आपकी भक्ति से प्रसन्न हूं। आप वर मांगिए।' गौतम ने भगवान शिव की स्तुति की ओर हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हुए कहा - 'देव ! आप मुझे निष्पाप कीजिए।' शिवजी ने कहा- 'मुने ! तुम धन्य हो।  तुम सदा निष्पाप हो। तुम्हारे साथ तो दुष्टों ने छल किया था। जिन दुरात्माओं ने तुम्हारे तुम साथ उपद्रव किया था, वह स्वयं दुराचारी, पापी एवं हत्यारे हैं।' शिवजी की बात सुनकर गौतम आश्चर्यचकित हो गए। उन्होंने कहा कि 'वे लोग मेरा बड़ा ही उपकार किए हैं। यदि वे ऐसा ना करते तो कदाचित आपका यह दुर्लभ दर्शन ना हुआ होता।' तदनंतर गौतम ऋषि ने शिवजी से गंगा मांगी। 

शिवजी ने गंगा से कहा, -'गंगे ! तुम गौतम ऋषि को पवित्र करो।' गंगा ने कहा कि मैं गौतम एवं उनके परिवार को पवित्र करके अपने स्थान पर चली जाऊंगी। किंतु भगवान शिव ने गंगा को लोकोपकारार्थ  वैवस्वत मुनि के अठाइसवे कलयुग तक रहने के लिए आदेश दिया। गंगा ने उनकी आज्ञा को स्वीकार किया और भगवान शिव को भी अपने सभी परिवार के साथ रहने के लिए प्रार्थना की।इसके बाद सभी ऋषि गण एवं देवगण गंगा, गौतम और शिव की जय-जयकार करने लगे। देवों के प्रार्थना करने पर भगवान शिव वहीं गौतम तट पर त्रंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रतिष्ठित हो गए। यह त्र्यंबक नामक ज्योतिर्लिंग सभी कामनाओं को पूर्ण करता है। यह महापातकों का नाशक और मुक्ति प्रदायक है। जब सिंह राशि पर बृहस्पति आते हैं तब इस गौतम तटपर सकल तीर्थ, देवगन और नदियों में श्रेष्ठ गंगा जी पधारती है तथा महाकुंभ पर्व होता है।


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