xmlns:og='http://ogp.me/ns#' भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों का नाम कैसे पड़ा - जाने संक्षिप्त विवरण Hindi में (Part-4)

भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों का नाम कैसे पड़ा - जाने संक्षिप्त विवरण Hindi में (Part-4)

९. श्रीवैद्यनाथ 

भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों का नाम कैसे पड़ा - जाने संक्षिप्त विवरण  Hindi में (Part-4)
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पटना कोलकाता रेल मार्ग पर किउल स्टेशन से दक्षिण-पूर्व १०० किलोमीटर पर देवघर है, इसे ही बैद्यनाथ धाम कहते हैं यहीं पर वैद्यनाथेश्वर ज्योतिर्लिंग है इसकी कथा इस प्रकार है --- रावण ने अतुल बल सामर्थ्य की प्राप्ति की इच्छा से भगवान शिव की आराधना प्रारंभ की। वह ग्रीष्म काल में पंचागनी सेवन करता था, जाड़े में पानी में रहता था एवं वर्षा-ऋतु में खुले मैदान में रहकर तप करता था। बहुत काल तक इस उग्र तप से भी जब शिवजी ने प्रत्यक्ष दर्शन नहीं दिया, तब उसने पार्थिव लिंग की स्थापना की और उसी के पास गड्ढा खोदकर अग्नि प्रज्जवलित की। 

वैदिक विधान से उस अग्नि के सामने उसने शिवजी की विधिवत पूजा की। रावण अपने सिर को काट-काटकर चढ़ाने लगा शिव जी की कृपा से उसका कटा हुआ सिर पुनः जुड़ जाता था। इस प्रकार उसने नौ बार सिर काटकर चढ़ाया। जब दसवीं बार वह सिर चढ़ाने को उघत हुआ, भगवान शिव प्रकट हो गए। भगवान शिव रावण से कहा -- 'मैं तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न हूं तुम अपना अभीष्ट वर मांग लो।' रावण ने उनसे अतुल बल-सामर्थ्य के लिए प्रार्थना की। भगवान शिव ने उसे वह वर दे दिया। रावण ने उनसे लंका चलने के लिए निवेदन किया। तब भगवान शिव ने उसके हाथ में एक शिवलिंग देते हुए कहा ---

'रावण ! यदि तुम इसे मार्ग में कहीं भी इस पृथ्वी पर रख दोगे तो यह वही अचल होकर स्थिर हो जाएगा। अतः इसे सावधानी से ले जाना।' रावण शिवलिंग को लेकर चलने लगा। शिवजी की माया से मार्ग में उसे लघुशंका की इच्छा हुई, जिसे वे रोक ना सका उसने पास में खड़े हुए एक गोपकुमार को देखा और निवेदन करके वह शिवलिंग उसी के हाथ में दे दिया। वह गोप उस शिवलिंग का भार सहन ना कर सका और उसने वही पृथ्वी पर उसे रख दिया। धरती पर पढ़ते ही वे शिवलिंग अचल हो गया। 

तत्पश्चात रावण उसे उठाने लगा, तब वह शिवलिंग उठ न सका। हताश होकर रावण घर लौटा। यही शिवलिंग 'वैद्यनाथेश्वर ज्योतिर्लिंग' के नाम से जगत में प्रसिद्ध हो गया। इस घटना को जानकर ब्रह्मा, इन्द्रादि समस्त देवगन वहां उपस्थित हो गए। देवगन ने भगवान शंकर का प्रत्यक्ष दर्शन किया। देवताओं ने उनकी प्रतिष्ठा की। अंत में देवगण 'वेदनाथ महादेव' की स्तुति करके अपने-अपने भवन को चले गए। वेदनाथ महादेव की पूजा-अर्चना से समस्त दुखों का शमन होता है और सुखों की प्राप्ति होती है। यह दिव्य शिवलिंग मुक्ति प्रदायक है। यहां दूर-दूर से जल लाकर चढ़ाने का अत्याधिक माहात्म्य वर्णित एवं लोक विश्रुत है। श्रद्धालु जन कंधे पर कांवर लेकर यहां की यात्रा संपन्न करते हैं। 

१०. श्रीनागेश्वर 

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श्री नागेश्वर भगवान का स्थान गोमती द्वारका से वेट-द्वारका को जाते समय लगभग १२-१३ मिल पूर्वोत्तर मार्ग पर है। इस लिंग की स्थापना के संबंध में शिवपुराण की कथा है कि प्राचीन काल में दारूका नाम की एक राक्षसी थी, जो पार्वती के वरदान से सदा घमंड में भरी रहती थी। अत्यंत बलवान राक्षस दारुक उसका पति था। उसने बहुत से राक्षसों को लेकर वहां सत्पुरुषों का संहार मचा रखा था। वह लोगों के यज्ञ और धर्म का नाश करता फिरता था। पश्चिम समुद्र के तट पर उसका एक वन था, जो संपूर्ण समृद्धियों से भरा रहता था। उस वन का विस्तार सब ओर से सोलह योजन था। दारूका अपने विलास के लिए जहां जाती थी वही भूमि, वृक्ष तथा अन्य सभी उपकरणों से युक्त वह वन भी चला जाता था। देवी पार्वती ने उस वन की देख-रेख का भर दारूका को सौंप दिया था। राक्षस दारूक अपनी पत्नी दारूका के साथ वहां रहकर सबको भय देता था। उस से पीड़ित हुई प्रजा ने महाऋषि और्व की शरण में जाकर उनको अपना दुख सुनाया। और्व ने शरणागतो की रक्षा के लिए राक्षसों को श्राप दे दिया कि 'यह राक्षस यदि पृथ्वी पर प्राणियों की हिंसा या यज्ञ को विध्वंस करेंगे तो उसी समय अपने प्राणों से हाथ धो बैठेंगे।

इधर देवताओं ने जब यह बात सुनी तब उन्होंने दुराचारी राक्षसों पर चढ़ाई कर दी। राक्षस बहुत घबराये। यदि वे लड़ाई में देवताओं को मारते तो मुनि के शाप से स्वयं भी मर जाते और नहीं मारते तो पराजित होकर भूखे मर जाते। इस अवस्था में दारूका ने कहा, --- भवानी के प्रधान से मैं इस सारे वन को जहां चाहुँ, ले जा सकती हूं। यह कहकर वह समस्त वन को ज्यों-का-त्यों लेकर समुद्र में जा बसी। अब राक्षस लोग पृथ्वी पर ना रहकर जल में रहने लगे और वहां प्राणियों को पीड़ा देने लगे। एक बार बहुत सी नावे उधर आ निकली, जो मनुष्य से भरी थी। राक्षसों ने उन में बैठे हुए सभी लोगों को पकड़ लिया और भेड़ियों से बांधकर कारागार में डाल दिया। वे अनेक प्रकार से उनको सताने लगे। उस दल का प्रधान सुप्रिया नाम का एक वैश्य था। वह बड़ा सदाचारी, भस्म-रुद्राक्षधारी तथा भगवान शिव का परम भक्त था। शिव की पूजा किए बिना भोजन भी नहीं करता था। उसने अपने बहुत से साथियों को भी शिव की पूजा सिखा दी थी। सब लोग 'नमः शिवाय' मंत्र का जाप और शंकर जी का ध्यान करने लगे थे। दारूक राक्षस को जब इस बात का पता चला तो उसने सुप्रिया की बड़ी भर्त्सना की और उसके साथ के राक्षस सुप्रिय को मारने दौड़े। उन राक्षसों को आता देख सुप्रिया भगवान शंकर को पुकारते हुए कहने लगा --- 'महादेव ! मेरी रक्षा कीजिए। दुष्टहंता महाकाल ! हमें इन दुष्टों से बचाइए भक्तवत्सल शिव ! अब मैं आप के ही अधीन हूँ और आप मेरा सर्वस्व हैं।'

सुप्रिया के इस प्रकार प्रार्थना करने पर भगवान शंकर एक विवरण में से निकल पड़े। उनके साथ ही चार दरवाजों का एक उत्तर मंदिर भी प्रकट हो गया। उसके मध्य भाग में अद्भुत ज्योति शिवलिंग प्रकाशित हो रहा था। उसके साथ शिव परिवार के सब लोग विद्यमान थे। सुप्रिया ने अपने साथियों के साथ उनका दर्शन कर पूजन किया। पूजित होने पर भगवान शंभू ने प्रसन्न हो स्वयं पाशुपतास्त्र लेकर प्रधान-प्रधान राक्षसों, उनके सारे उपकरणों तथा सेवकों को भी तत्काल ही नष्ट कर दिया और उन दुष्टहंता शंकर ने अपने भक्त सुप्रिया की रक्षा की। इधर राक्षसी दारूका ने दीन चित से देवी पार्वती की स्तुति की और अपने वंश की रक्षा करने की प्रार्थना की। इस पर प्रसन्न होकर महादेवी ने उसे अभयदान दिया। इस प्रकार अपने भक्तों के पालन और उनकी रक्षा के लिए भगवान शंकर और पार्वती स्वयं वहां स्थित हो गए। ज्योतिर्लिंग स्वरूप महादेव जी वाह नागेश्वर कहलाए और देवी शिवा नागेश्वरी के नाम से विख्यात हुई। इनके दर्शन का माहात्म्य अलौकिक है। शिव पुराण में कहा गया है कि जो आदर पूर्वक इनकी उत्पत्ति और माहात्म्य को सुनेगा, वह समस्त पापों से मुक्त होकर समस्त सुखों को भोगता हुआ अंत में परम पद को प्राप्त होगा।

बाकि के ज्योतिर्लिंगो के बारे में जानने के लिए निचे दिए गए पार्ट्स पर क्लिक करें। 

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