xmlns:og='http://ogp.me/ns#' Sawan Somwar 2020 - व्रत कथा

Sawan Somwar 2020 - व्रत कथा

Sawan Somwar 2020 - एक बार की बात है, एक साहूकार एक गाँव में रहा करता था। वह बहुत धनि आदमी था।  हालाँकि, उनका कोई बच्चा नहीं था। इस वजह से वह हमेशा दुखी और चिंतित रहता था। बेटा पैदा करने के लिए वह हर सोमवार को समर्पित रूप से उपवास करता था। वह भगवान शिव और पार्वती जी के मंदिर जाते थे और वहां पूजा करते थे। आप सभी को सावन सोमवर व्रत के बारे में जानना आवश्यक है।

Sawan Somwar 2020 -  व्रत कथा

Sawan Somwar 2020, Shubh muhurat and Vrat Katha- सावन, भगवान शिव को समर्पित महीना किया गया है और इस महीने का दूसरा सोमवार है, आज सबसे शुभ दिनों में से एक है। पुरुष और महिलाएं आज व्रत रखकर भगवान शिव की प्रार्थना करते हैं। इस महीने में सावन के चार सोमवार पड़ेंगे। व्रत का पालन हिंदू मान्यताओं में बहुत धार्मिक महत्व रखता है। हर भगवान और देवी को समर्पित एक कहानी है, जिसे बिना पढ़े, उपवास के महत्व को कम करता है। सोमवार भगवान शिव को समर्पित है और इस प्रकार, सावन के दौरान सोमवार का व्रत रखने का महत्व है। ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव कथा को पढ़ना और सुनना आपके व्रत को फलदायी बनाने के लिए वास्तव में महत्वपूर्ण है।

सावन का पहला सोमवार - 6 जुलाई 2020 

सावन का दूसरा सोमवार - 13 जुलाई 2020 

सावन का तीसरा सोमवार - 20 जुलाई 2020 

 सावन का चौथा सोमवार- 27 जुलाई 2020 

सावन का पांचवा सोमवार - 03 अगस्त 2020

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Sawan Somwar 2020, Vrat Katha- एक बहुत धनवान साहूकार था जिसके घर धन आदि किसी प्रकार की कमी नहीं थी, परंतु उसको एक दुख था कि उसके कोई पुत्र नहीं था। वह इसी चिंता में रात दिन रहता था। वह पुत्र की कामना के लिए प्रति सोमवार को शिवजी का व्रत और पूजन किया करता था तथा सांयकाल को शिव मंदिर में जाकर के शिवजी के श्री विग्रह के सामने दीपक जलाया करता था। उसके इस भक्ति भाव को देखकर एक समय श्री पार्वती जी ने शिवजी महाराज से कहा कि महाराज यह साहूकार आपका अनन्य भक्त और सदैव आपका व्रत और पूजन बड़ी श्रद्धा से करता है। इसकी मनोकामना पूर्ण करनी चाहिए।

शिवजी ने कहा- "हे पार्वती ! यह संसार कर्म क्षेत्र है जैसे किसान खेत में जैसा बीज बोता है, वैसा ही फल काटता है। उसी तरह इस संसार में जैसा कर्म करते हैं। वैसा ही फल भोगते हैं।" पार्वती जी ने अत्यंत आग्रह से कहा-  "महाराज ! जब यह आपका अनन्य भक्त है और आपको इस चीज को अगर किसी प्रकार का दुख है तो इसको अवश्य दूर करना चाहिए क्योंकि आप सदैव अपने भक्तों पर दयालु होते हैं और उनके दुखों को दूर करते हैं। यदि आप ऐसा नहीं करेंगे तो मनुष्य आपकी सेवा तथा व्रत क्यों करेंगे। "

पार्वती जी का ऐसा आग्रह देख शिवजी महाराज कहने लगे- "हे पार्वती ! इसके कोई पुत्र नहीं है। इसी चिंता में यह भी दुखी रहता है। इसके भाग्य में पुत्र ना होने पर भी मैं इसको पुत्र की प्राप्ति का वर देता हूं, परंतु यह पुत्र केवल 12 वर्ष तक जीवित रहेगा। इसके पश्चात वह मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा। इससे अधिक मैं और कुछ इसके लिए नहीं कर सकता।" यह सब बातें साहूकार सुन रहा था। इससे उसको ना कुछ प्रसन्नता हुई और ना ही कुछ दुख हुआ। वह  पहले जैसा ही शिवजी महाराज का व्रत और पूजन करता रहा। कुछ काल व्यतीत हो जाने पर साहूकार की स्त्री गर्भवती हुई और दसवें महीने के गर्भ से अति सुंदर पुत्र की प्राप्ति हुई। 

साहूकार के घर में बहुत खुशी मनाई गई, परंतु साहूकार ने उसकी केवल 12 वर्ष की आयु जान कोई अधिक प्रसन्नता प्रकट नहीं की और न ही किसी को भेद  ही बताया।  जब वह बालक 11 वर्ष का हो गया तो उस बालक की माता ने उसके पिता से विवाह आदि के लिए कहा तो वह साहूकार कहने लगा कि अभी मैं इसका विवाह नहीं करूंगा। अपने पुत्र को काशी जी पढ़ने के लिए भेजूंगा। फिर साहूकार ने अपने साले अर्थात बालक के मामा को बुला उसको बहुत सा धन देकर कहा, तुम इस बालक को काशी जी पढ़ने के लिए ले जाओ और रास्ते में जिस स्थान पर भी जाओ, यज्ञ करते और ब्राह्मणों को भोजन कराते जाओ। 

वह दोनों मामा-भांजे यज्ञ करते और ब्राह्मणों को भोजन कराते जा रहे थे। रास्ते में उनको एक शहर पड़ा। उस शहर में राजा की कन्या का विवाह था और दूसरे राजा का लड़का जो विवाह कराने के लिए बरात लेकर आया था। वह एक आंख से काना था। उसके पिता को इस बात की बड़ी चिंता थी कि कहीं वह वर को देख कन्या के माता-पिता विवाह में किसी प्रकार की अड़चन पैदा ना कर दें। इस कारण वह जब उसने अति सुंदर सेठ के लड़के को देखा तो मन में विचार किया कि क्यों ना दरवाजे के समय लड़के से वर का काम चलाया जाये। ऐसा विचार कर वर के पिता ने उस लड़के और मामा से बात किया तो वे राजी हो गए। 

फिर उस लड़के को वर कपड़े पहना तथा घोड़ी पर चढ़ा दरवाजे पर ले गए और सब कार्य प्रसन्नता से पूर्ण हो गया। फिर वर के पिता ने सोचा कि यदि विवाह कार्य भी इसी लड़के से करा लिया जाए तो क्या बुराई है ऐसा विचार कर लड़के और उसके मामा ने कहा, यदि आप फेरों का और कन्यादान के काम को भी करा दें तो आपकी बड़ी कृपा होगी और मैं इसके बदले आप को बहुत कुछ धन दूंगा तो उन्होंने स्वीकार कर लिया और विवाह कार्य भी बहुत अच्छी तरह से संपन्न हो गया। 


परंतु जिस समय लड़का जाने लगा तो उसने राजकुमारी की चुंदड़ी के पल्ले पर लिख दिया कि तेरा भी बात तो मेरे साथ हुआ है परंतु जिस राजकुमार के साथ तुम को भेजेंगे। एक आंख से काना है और मैं काशी जी पढ़ने जा रहा हूं। लड़के के जाने के पश्चात उस राजकुमारी ने जब अपनी चुंदड़ी पर ऐसा लिखा हुआ पाया तो उसने राजकुमार के साथ जाने से मना कर दिया और कहा कि यह मेरा पति नहीं है। मेरा विवाह इसके साथ नहीं हुआ है। वह तो काशी जी पढ़ने गया है। राजकुमारी के माता-पिता ने अपनी कन्या को विदा नहीं किया और बारात वापस चली गयी। 

उधर सेठ का लड़का और उसका मामा काशी जी पहुंच गए। वहां जाकर उन्होंने यज्ञ करना और लड़के ने पढ़ना शुरू कर दिया। जब लड़के की आयु 12 साल की हो गई। उस दिन उन्होंने यज्ञ रचा रखा था कि लड़के ने अपने मामा से कहा-  मामा जी आज मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं है। मामा ने कहा- " पुत्र तुम अंदर जाकर सो जाओ।" लड़का अंदर जाकर सो गया और थोड़ी देर के पश्चात् उसके प्राण निकल गए। जब उसके मामा ने आकर देखा तो वह मुर्दा पड़ा हुआ था तो उसको बहुत दुख हुआ और उसने सोचा कि अगर मैं कभी रोना-पीटना मचा दूंगा तो यज्ञ का कार्य अधूरा रह जाएगा। अतः उसने जल्दी से यज्ञ का कार्य समाप्त कर ब्राह्मणों के जाने के बाद रोना पीटना आरंभ कर दिया। 

संयोगवश उसी समय शिव और पार्वती जी उधर से जा रहे थे। जब उन्होंने जोर-जोर से रोने की आवाज सुनी तो पार्वती जी कहने लगी। महाराज ! कोई दुखिया रो रहा है इसके कष्ट को दूर कीजिए जब शिवजी और पार्वती जी पास जाकर देखें तो वहां एक लड़का मुर्दा पड़ा था। पार्वती जी कहने लगी। महाराज यह तो उसी सेठ का लड़का है जो आप के वरदान से हुआ था। शिवजी कहने लगे- "हे पार्वती ! इसकी आयु कितनी थी तो यह भोग चुका। तब पार्वती जी ने कहा है महाराज इस बालक को और आयु दो नहीं तो इसके माता-पिता तड़प-तड़प कर मर जाएंगे।" पार्वती जी के बार-बार आग्रह करने पर शिवजी ने उसको जीवन वरदान दिया और शिव जी महाराज की कृपा से लड़का जीवित हो गया। शिवजी और पार्वती कैलाश पर्वत चले गए। 

तब वह लड़का और मामा उसी प्रकार यज्ञ करते तथा ब्राह्मणों को भोजन कराते अपने घर की ओर चल पड़े। रास्ते में उसी शहर में आए जहां उसका विवाह हुआ था। वहां पर आकर उन्होंने यज्ञ आरंभ कर दिया तो उस लड़के के ससुर ने उसको पहचान लिया और अपने महल में ले जाकर उसकी बड़ी खातिर की, साथ ही बहुत दास-दसियों सहित आदर पूर्वक लड़की और जमाई को विदा किया। जब वह अपने शहर के निकट आए तो मामा ने कहा कि मैं पहले तुम्हारे घर जाकर खबर कर आता हूं। 

जब उस लड़के का मामा घर पहुंचा तो लड़के के माता-पिता घर की छत पर बैठे थे और यह प्रण कर रखा था कि यदि हमारा पुत्र सकुशल लौट आया तो हम राजी खुशी नीचे आ जाएंगे। नहीं तो छत से गिरकर अपने प्राण खो देंगे। इतने में उस लड़के के मामा ने जा कर यह समाचार दिया कि आपका पुत्र आ गया है तो उनको विश्वास नहीं आया तब उसके मामा ने शपथ पूर्वक कहा कि आपका पुत्र अपनी स्त्री के साथ बहुत सारा धन साथ लेकर आया है तो सेठ ने आनंद के साथ उसका स्वागत किया और बड़ी प्रसन्नता के साथ रहने लगे। इसी प्रकार से जो कोई भी सोमवार के व्रत को धारण करता है अथवा इस कथा को पड़ता है या सुनता है उसकी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। 


सावन सोमवार के व्रत में क्या खाये- सोमवार के व्रत में कुछ लोग मीठा और कुछ लोग नमकीन चीजों का सेवन करते है।  नमकीन चीजो के लिए सेंधा नमक का इस्तेमाल किआ जाता है। व्रत में कई तरह के पकवान त्यार किए जाते है जैसे कि कुट्टू के आटे की टिक्की, कुट्टू की पूड़ी, व्रत वाले चावल इत्यादि। 

Sawan Somwar 2020- कैसे प्रसंन्न होंगे  भोले बाबा 

श्री सोमवार आरती 


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