xmlns:og='http://ogp.me/ns#' भगवन शिव की अष्टमूर्तियों की उपासना

भगवन शिव की अष्टमूर्तियों की उपासना

'शिव' परमात्मा या ब्रह्मा का ही नामांतर है। वे शांत, शिव, अद्वैत और चतुर्थ है, वह विश्वाघ, विश्वबीज, विश्वदेव, विश्वरूप, विश्वाधिक और विश्वांतर्यामी है। अर्थात सब कुछ शिव ही है, शिवमय के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है।  यह समस्त जगत पृथ्वी आदि पंच भूतों में संगठित है। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, चंद्र, सूर्य और जीवात्मा ---- इन्हीं अष्टमूर्तियों द्वारा समस्त चराचर का बोध होता है, इसलिए देवाधिदेव भगवान शंकर का एक नाम 'अष्टमूर्ति' भी है। भगवान शंकर की इन अष्टमूर्तियों के नाम इस प्रकार है ---- शर्व, भव, रुद्र, उग्र, भीम, पशुपति, महादेव और ईशान। ये ही शर्व आदि अष्टमूर्तियां क्रमश: पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, क्षेत्रज्ञ, सूर्य और चंद्रमा को अधिष्ठित किए हुए हैंं। 

ॐ शर्वाय क्षितिमूर्तिये नम:
ॐ भवाय जलमूर्तये नम:
ॐ रुद्रायाग्निमूर्तये नम:
ॐ उग्राय वायुमूर्तये नम:
ॐ भीमायाकाश्मूर्तये नम: 
ॐ पशुपतये यजमानमूर्तये नम:
ॐ महादेवाय सोममूर्तये नम:
ॐ ईशानाय सूर्यमूर्तये नम:

परमात्मा शिव की यह अष्टमूर्तियां समस्त संसार को व्याप्त किए हुए हैं, इस कारण विश्वात्मा शिव की उपासना करने से उनका जगद्रुप शरीर पुष्टि लाभ करता है। यही शिव की वास्तविक आराधना है। इस कारण अपनी अष्टमूर्तियों के द्वारा जो अखिल विश्व को अधिष्ठित किए हुए हैं, उन परम कारण महादेव की सर्वतोभावेन आराधना करनी चाहिए। प्रत्यक्ष रूप में भगवान शिव अपनी अष्ट मूर्तियों के रूप में अधिष्ठित होकर अपने भक्तों का कल्याण कर रहे हैं। यह अष्टमूर्ति स्वरूप भगवान शिव के अर्चा-विग्रहों का किंचित विवरण दिया जा रहा है

अष्टमूर्ति के उपास्य रूप

१. क्षिति-लिंग --- शिवकांची 

भगवन शिव की अष्टमूर्तियों की उपासना


पंचभूतों के नाम से जो पांच लिंग प्रसिद्ध है, वे सभी दक्षिण भारत में स्थित है इनमें से एकाम्रेश्वर का क्षितिलिंग  शिवकांची में है। अयोध्या आदि मोक्षदायिनी सप्त पुरीयों में कांचीपुरी भी है, इसे हरीहरात्मक पूरी भी कहा जाता है, क्योंकि इसके शिवकांची और विष्णुकांची नामक दो भाग हैं। कांजीवरम स्टेशन से लगभग १ मील दूर सर्व तीर्थ नामक एक सरोवर है। इसी सरोवर से लगभग १ फर्लांग दूर भगवान एकाम्रेश्वर का भव्य एवं विशाल मंदिर है। मुख्य मंदिरों में तीन द्वारों के भीतर श्रीएकाम्रेश्वर शिवलिंग स्थित है, लिंगमूर्ति श्याम है। लिंग मूर्ति के पीछे श्रीगौरी-शंकर की युगल मूर्ति है। भगवान एकाम्रेश्वर जल नहीं चढ़ाया जाता, चमेली के सुगंधित तेल से अभिषेक होता है।  मुख्य मंदिर की दो परिक्रमाएँ हैं, जिनमें शिव भक्तगण, गणेशजी, नंदीश्वर, कालिका देवी आदि के छोटे-छोटे मंदिर हैं। जगमोहन में ६४ योगिनियों की मूर्तियां है। 

भगवान एकाम्रेश्वर के प्राकटय विषय में कहा जाता है कि एक बार भगवती पार्वती ने कौतूहल वश भगवान शंकर के नेत्रों को बंद कर दिया, फलस्वरूप तीनों लोकों में महान अंधकार छा गया। असमय में ही इस प्रलयकारी दृश्य को देखकर भगवान शंकर ने इसके प्रायश्चित्त स्वरूप पार्वतीजी को तपस्या करने का आदेश दिया, तदनुसार भगवती उमा ने बालूकामय लिंग बनाकर कठोर तपस्या की। भगवती पार्वती द्वारा प्रतिष्ठित स्थावर लिंग ही शिवकांची का एकाम्र नाथ क्षितिलिंग है। 

२. जलतत्व लिंग --- जंबुकेश्वर 

भगवन शिव की अष्टमूर्तियों की उपासना

पञ्चतत्व-लिंगो में जंबुकेश्वर आपोलिंगम (जलतत्व लिंग) माना जाता है। त्रिचिनापल्ली में श्री रङ्गम से 1 मील दूरी पर एक जल प्रवाह के ऊपर जंबुकेश्वर लिंग साबित है। लिंग मूर्ति के नीचे से जल ऊपर को आता है। स्थापत्य शिल्प की दृष्टि से यह मंदिर बहुत उत्तम बना है। मंदिर के बाहर पांच परकोटे हैं। यहां के जंबु अर्थात जामुन के पेड़ का भी बड़ा महत्व है। इसी महिमा पर इस जलमूर्ति का नाम जंबुकेश्वर पड़ा है। 

३. तेजोलिंग --- अरुणाचल 

भगवन शिव की अष्टमूर्तियों की उपासना

अरुणाचलम का ही तमिल नाम तिरुवन्नमलै। है यहाँ भगवान शंकर का दिव्य अग्निस्वरूप तेजोलिंग अवस्थित है। अरुणाचलेश्वर शिव का  विशाल है और इस मंदिर का गोपुर दक्षिण भारत का सबसे चौड़ा  माना जाता है। तीन गोपुर पार करने के बाद अरुणाचलेश्वर का निज मंदिर है। कहा जाता है की भगवती पार्वती ने कुछ काल तक अरुणाचल-तीर्थ में तपस्या की। फलस्वरूप अरुणाचल पर्वत में अग्नि शिखा के रूप में एक तेजोलिंग का प्रादुर्भाव हुआ। यही अग्निस्वरूप तेजोलिंग है। यहां कार्तिक-पूर्णिमा के समय विशेष महोत्सव होता। है मंदिर की परिक्रमा में  भी अनेक देवी-देवताओं के भव्य विग्रह प्रतिष्ठित है।   

४. वायुलिंग --- कालहस्तीश्वर 

भगवन शिव की अष्टमूर्तियों की उपासना

तिरुपति बालाजी से कुछ ही दूर स्वर्णामुखी नदी के पवित्र तटपर भगवान शिव श्रीकालहस्तीश्वर नाम से वायुलिंग के रूप में प्रतिष्ठित है। मंदिर बहुत सुंदर और ऊंचा है। मंदिर के गर्भ गृह में प्रकाश का अभाव है, भगवान के दर्शन दीपक के प्रकाश में होते हैं। लोगों का विश्वास है कि यहां एक विशेष वायु के झोंके के रूप में भगवान सदाशिव सदा विराजमान रहते हैं। मंदिर की परिक्रमा में अनेकों देवी-देवताओं की मूर्तियां प्रतिष्ठित है। यहां की शिव मूर्ति गोल नहीं अपितु चौकोर है। इस मूर्ति के सामने महान शिवभक्त कण्णप्प की भी एक प्रतिमा है। इस विलक्षण शिव भक्त ने अपने दोनों नेत्र निकालकर भगवान को अर्पण कर उनकी अखंड भक्ति प्राप्त की थी। ऐसी भी कथा है कि सर्वप्रथम मकड़ी, सर्प तथा हाथी ने यहां आराधना की थी और उनके नाम पर ही भगवान शंकर के इस लिंग का (श्री-मकड़ी, काल-- सर्प तथा हस्ती-- हाथी) 'श्रीकालहस्तीश्वर' यह नाम पड़ा। ऐसा विश्वास किया जाता है कि काशी की भांति यहां भी भगवान शंकर मरने वालों के कान में तारक मंत्र सुनाकर उन्हें मुक्त कर देते हैं। पास ही एक पहाड़ी पर भगवती दुर्गा का भी मंदिर है। महाशिवरात्रि के अवसर पर यहां बहुत बड़ा उत्सव होता है। 

५. आकाशलिंग --- चिदंबरम 

चिदंबरम दक्षिण भारत का प्रमुख तीर्थ है पंचतत्व लिंगों में भगवान का आकाश तत्वमय लिंग चिदंबरम में ही प्रतिष्ठित है। यहां का मंदिर कावेरी नदी के तटपर बड़े सुरम्य स्थान में बना हुआ है। यहां मूल मंदिर में कोई मूर्ति नहीं है। एक दूसरे ही मंदिर में तांडवनृत्यकारी चंद्रेश्वर की नटराजमयी मनोरम मूर्ति विद्यमान है। चिदंबरम का अर्थ है -- चित्- ज्ञान, अंबर-अकाश, अर्थात निदाकाश। भगवान नटराज का निज मंदिर पांचवे घेरे में है। मंदिर में नृत्य मुद्रा में भगवान नटराज की बहुत ही सुंदर स्वर्णमयी प्रतिमा है। श्रीनटराज के दाहिनी ओर काली भित्ति में एक यंत्र उत्कीर्ण है। यहां सोने की मालाएं लटकती रहती हैं, यह नीला शून्यकाश कि आकाशतत्व लिंग है। स्थान पर प्राय: पर्दा पड़ा रहता है। अभिषेक के समय दर्शन होता है। मंदिर में सोने से मड़ा हुआ एक बड़ा सा दक्षिणावर्त शंख स्थापित है जिसकी विशेष महिमा है। 

६. सूर्य-मूर्ति 

भगवन सूर्य सर्वसाक्षी प्रत्यक्ष देवता है। शिव और सूर्य में कोई भेद नहीं है। शास्त्र का वचन है---

आदित्य च शिवं विद्याच्छिवमादित्यरुपिणम। 
उभयोरन्तरं नास्ति ह्रदितिय शिवस्य च।।

अर्थात शिव और सूर्य तत्वत: एक ही है, दोनों में कोई अंतर नहीं है। अतः प्रत्येक सूर्य मंदिर भगवान शिव की सूर्य मूर्ति का अवबोधक है। 

७. चंद्र-मूर्ति 

काठियावाड़ के सोमनाथ और बंगाल में चटगांव के समीपस्थ स्थित चंद्रनाथ ज्योतिर्मयी भगवान शिव की चंद्रमूर्ति  के प्रतीक हैं। सोमनाथ का मंदिर प्रभास क्षेत्र में है. इन दोनों क्षेत्रों में भगवान शिव चंद्र रूप में पूजित होते हैं। 

८. यजमानमूर्ति --- पशुपतिनाथ 

भगवान शिव की अष्ट मूर्तियों में नेपाल के पशुपतिनाथ महादेव यजमान मूर्ति के प्रतीक हैं। श्रीपशुपतिनाथ लिंग रूप में नहीं, अपितु मानुषी-विग्रह के रूप में विराजमान है। नेपाल-क्षेत्र को पशुपत-क्षेत्रों में परीगणित किया गया है। नेपाल-माहात्म्य, सकंदपुराण, शिवपुराण तथा वराहपुराण आदि में इस क्षेत्र की महिमा वर्णित है। यहां वागमती नामक एक पवित्र नदी है, उसी नदी के दक्षिणी तटपर काठमांडू नगर में देवपत्तन नामक स्थान पर भगवान पशुपतिनाथ महादेव का प्रसिद्ध मंदिर है। मंदिर पैगोडा-शैली में निर्मित है। यहां के लिंग के प्रादुर्भाव के संबंध में यह प्रसिद्ध है कि श्लेष्मान्तक नामक वन में सिद्धचल के निकट देवनदी वागमती के तटपर एक स्थल पर कामधेनु नित्य स्वेच्छ या दुग्ध शरण कर जाती थी, इस स्थान पर भगवान शिव गुप्त रूप से निवास करते थे। 

ब्रह्मा जी भगवान विष्णु को साथ लेकर स्थान पर आये और स्वयंभू ज्योति:स्वरूप का दर्शन कर उनकी प्रार्थना करने लगे। इसी तेज:पूञ्च के ऊपर ब्रह्मा और विष्णु ने भगवान की रत्नमयी पंचमुखी लिंगमूर्ति की प्रतिमा स्थापित की और भगवान से वहां उसी रूप में प्रतिष्ठित होने की प्रार्थना की। भगवान ने प्रसन्न होकर उसी रूप में वहां रहना स्वीकार किया। वर्तमान में उस मणिमय स्वर्णलिंग का दर्शन प्राप्त होता है। यहां का मंदिर बड़ा ही भव्य है।  महाशिवरात्रि के अवसर पर यहां विशाल मेला लगता है। मंदिर परिसर में --- गणेश, सूर्य, भैरव, विष्णु, वासुकी, जयमंडला, नीलसरस्वती, शीतलादेवी, अष्टमातृका, नवग्रह, नीलकंठ, वीरभद्र, महाकाली, विरुपाक्ष, नंदी, भृङ्गी आदि देवी-देवताओं की प्रतिमाएं प्रतिष्ठित है। नेपाल क्षेत्र के कोशी-त्रिशूली के मध्य अवस्थित कुशेश्वर, भीमेश्वर, कार्पेश्वर, कश्यपेष्वर, स्फटिकेशवर,चंदेश्वर,धनेश्वर,इन्द्रेश्वर,कालेश्वर,असितेष्वर आदिचतु:षष्टि शिवलिंग की यात्रा तथा गुह्यश्वरीदेवी के दर्शनों का भी यहां विशेष महत्व है। 

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