xmlns:og='http://ogp.me/ns#' Ravivar Vrat Katha - सूर्य देव व्रत कथा और विधि

Ravivar Vrat Katha - सूर्य देव व्रत कथा और विधि

Ravivar Vrat Katha - सूर्य देव व्रत कथा और विधि
पंजाब केसरी 

बहुत समय पुराणी बात है, एक बुढ़िया थी। उसका नियम था प्रति रविवार को सवेरे ही स्नान आदि कर घर को गोबर से लिपकर फिर भोजन तैयार कर भगवान को भोग लगा स्वयं भोजन करती थी। ऐसा व्रत करने से उसका घर अनेक प्रकार धन धान्य से पूर्ण था। श्रीहरि की कृपा से घर में किसी प्रकार का विघ्न या दु:ख नहीं था। सब प्रकार से घर में आनंद रहता था। इस तरह कुछ दिन बीत जाने पर उसकी एक पड़ोसन जिसकी गौ का गोबर वह बुढ़िया लाया करती थी। विचार करने लगी कि यह वृद्धा सर्वदा मेरी गांव का गोबर ले जाती है। इसलिए अपनी गो को घर के भीतर बांधने लग गई। बुढ़िया को गोबर ना मिलने से रविवार के दिन अपने घर को ना लीप सकी। इसलिए उसने ना तो भोजन बनाया और ना भगवान को भोग लगाया तथा स्वयं भी उसने भोजन नहीं किया। इस प्रकार उसने निराहार व्रत किया। 

रात्रि हो गई और वह भूखी सो गई। रात्रि में भगवान ने उसे स्वप्न दिया और भोजन ना बनाने तथा भोग न लगाने का कारण पूछा। वृद्धा ने गोबर ना मिलने का कारण सुनाया। तब भगवान ने कहा कि माता हम तुमको ऐसी गौ देते हैं जिससे सभी इच्छाएं पूर्ण होती हैं क्योंकि तुम हमेशा रविवार को गौ के गोबर से लिप कर भोजन बनाकर मेरा भोग लगाकर खुद भोजन करती हो। इसलिए मैं खुश होकर तुम को यह वरदान देता हूं। निर्धन को धन और भांझ स्त्रियों को पुत्र देकर दुखों को दूर करता हूं तथा अंत समय में मोक्ष देता हूं। स्वप्न में ऐसा वरदान देकर भगवान तो अंतर्ध्यान हो गए और जब वृद्ध की आंख खुली तो वह देखती है कि आंगन में एक अति सुंदर गौ और बछड़ा बंधे हुए हैं। वे गौ और बछड़े को देखकर अत्यंत प्रसन्न हुई और उसको घर के बाहर बांध दिया वहीं खाने को चारा डाल दिया। जब उसकी पड़ोसन बुढ़िया ने घर के बाहर एक अति सुंदर गौ बछड़े को देखा तो  द्वेष के कारण उसका हृदय जल उठा ताथा जब उसने देखा कि गौ सोने का गोबर किया है तो वह उस गांव का गोबर ले गई और अपनी गौ का गोबर उसकी जगह पर रख गई। 

वह नित्य प्रति ऐसा ही करती रही और सीधी सीधी बुढ़िया को इसकी खबर नहीं होने दी। तब सर्वव्यापी ईश्वर ने सोचा कि चालक पड़ोसन के कर्म से बुढ़िया ठगी जा रही है। भगवान संध्या के समय अपनी माया से बड़े जोर की आंधी चला दी। बुढ़िया ने अंधेरी से अपनी गौ को घर के भीतर बांद लिया। प्रात:काल उठकर जब वृद्धा ने देखा कि गौ ने सोने का गोबर दिया है तो उसके आश्चर्य की सीमा न रही और वह प्रतिदिन गो को घर के भीतर बांधने लगी। उधर पड़ोसन ने देखा की बुढ़िया गौ को घर के भीतर बांधने लगी है और उसका सोने का गोबर उठाने का दांव नहीं चलता तो वे ईर्ष्या और डाह से जल उठी और कुछ उपाय ना देख पड़ोसन ने उस देश के राजा की सभा में जाकर कहा महाराज मेरे पड़ोस में एक वृद्ध के पास ऐसी गौ है जो आप जैसे राजाओं के ही योग्य है, वे नित्य सोने का गोबर देती है। आप उस सोने से प्रजा का पालन करिए। वृद्धा इतने सोने का क्या करेगी। राजा ने यह बात सुन अपने दूतों को वृद्धा के घर से गौ लाने की आज्ञा दी। वृद्धा प्रातः ईश्वर का भोग लगा भोजन ग्रहण करने ही जा रही थी कि राजा के कर्मचारी गऊ खोल कर ले गए। वृद्ध काफी रोई-चिल्लाई किंतु कर्मचारियों के समक्ष कोई क्या कहता? उस दिन वृद्धा गऊ के वियोग में भोजन ना खा सकी और रात भर रो कर ईश्वर से गौ को पुनः पाने के लिए प्रार्थना करती रही। उधर राजा गौ देख बहुत प्रसन्न हुआ लेकिन सुबह जैसे ही वे उठा सारा महल गोबर से भरा दिखाई दिया। 

राजा यह देखकर घबरा गया। भगवान ने रात्रि में राजा को स्वप्न में कहा कि राजा गाय वृद्धा को लौटाने में ही तेरा भला है। उसके रविवार के व्रत से प्रसन्न होकर मैंने उसे गाय दी थी। प्रात: होते ही राजा ने वृद्धा को बुलाकर बहुत से धन के साथ सम्मान सहित गऊ बछड़ा लौटा दिया। उसकी पड़ोसन दृष्ट बुढ़िया को बुलाकर उचित दंड दिया। इतना करने के बाद राजा के महल से गंदगी दूर हुई। उसी दिन से राजा ने नगर निवासियों को आदेश दिया कि राज्यों की तथा अपनी समस्त मनोकामना की पूर्ति के लिए रविवार का व्रत करो। व्रत करने से नगर के लोग सुखी जीवन व्यतीत करने लगे। कोई भी बीमारी तथा प्रकृति का प्रकोप उस नगर पर नहीं होता था। सारी प्रजा सुख से रहने लगी।

रविवार (इतवार)  व्रत करने की विधि 

सर्व मनोकामनाओं की पूर्ति हेतु रविवार का व्रत श्रेष्ठ है। इस व्रत की विधि इस प्रकार है। प्रात काल स्नानादि से निवृत्त हो स्वच्छ वस्त्र धारण करें। शांतचित्त होकर परमात्मा का स्मरण करें। भोजन एक समय से अधिक नहीं करना चाहिए। भोजन तथा फलाहार सूर्य के प्रकाश रहते ही कर लेना उचित है। यदि निराहार रहने पर सूर्य छिप जाए तो दूसरे दिन सूर्य उदय हो जाने पर अर्ध्य देने के बाद ही भोजन करें। व्रत के अंत में व्रत कथा सुननी चाहिए। व्रत के दिन नमकीन तेल युक्त भोजन कदापि ग्रहण न करें। इस व्रत के करने से मान सम्मान बढ़ता है तथा शत्रुओं का क्षय होता है। आंख की पीड़ा के अतिरिक्त अन्य सब पीड़ायें दूर होती है। 


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